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परम पूज्य के.एस. सुदर्शन जी की जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित, राष्ट्र चिंतन और ग्राम विकास के अग्रदूत को किया नमन

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अनूपपुर //वेद शर्मा // कुप्पाहाली सीतारमय्या सुदर्शन का जन्म 18 जून 1931 को हुआ था। वे राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघ चालक थे
कुप्पाहाली सीतारमय्या सुदर्शन का जन्म 18 जून 1931 को हुआ था। वे राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघ चालक थे। मार्च 2009 में मोहन भागवत को छठवां सरसंघचालक नियुक्त करके स्वेच्छा से पदमुक्त होगए। 15 सितम्बर 2012 को अपने जन्मस्थान रायपुर में 81 वर्ष की अवस्था में इनका निधन हो गया।

के एस सुदर्शन का जन्म रायपुर (छत्तीसगढ़) में एक कन्नड़ भाषी परिवार में हुआ था। उन्होंने जबलपुर के राजकीय इंजीनियरी महाविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय) से दूरसंचार प्रौद्योगिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की थी। 16 जनवरी 2009 को मेरठ के शोभित विश्वविद्यालय ने उनको डॉक्टर आफ आर्ट्स की मानद उपाधि से विभूषित किया था।

81 वर्ष की अवस्था में भी सुदर्शन जी का अपना जीवन दर्शन बहुत बाल सुलभ था। अक्सर लोग उनके इस बाल सुलभ दर्शन को परख नहीं पाते थे और सवाल उठाते थे लेकिन स्वयंसेवक से सरसंघचालक तक की अपनी संघ यात्रा में उनकी सहजता, सरलता और भारतीय परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। ह्वदयरोग जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद उन्हें देशज तरीकों और परहेजों से ह्वदयरोग को दूर रखा। लेकिन आज उसी ह्वदय पर लगे आघात ने उन्हें हम सबसे हमेशा के लिए दूर कर दिया।

सुदर्शन जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्वयंसेवक से सरसंघचालक बने। इस दौरान उनके निर्दोष, सरल और सहज किंतु स्पष्ट और बेबाक विचारों के कारण कई बार विवाद भी हुआ। सोनिया माइनों पर उनकी टिप्पणी हो या गांधी हत्या के बारे में उनके विचार, अपने तथ्यपरक विचारों को उन्होंने कभी छुपाया नहीं। वे मतभेद और प्रेम कभी छुपाते नहीं थे। एनडीए सरकार की नीतियों और कार्यपद्धति पर उनकी प्रतिक्रियाओं से खासा विवाद भी हुआ था। वे राजनीति की कुटिलता और प्रपंच को बखूबी समझते थे, लेकिन अपने व्यक्तित्व की सरलता के कारण वे कुटिलताओं और प्रपंचों से हमेशा हारते रहे। कई दफे विवादित भी हुए।

शायद यही कारण था कि बाद के दिनों में अपना अधिक समय ग्राम विकास, हिन्दी के विकास और विस्तार, तकनीकों के स्थानीकरण और उसे लोकोपयोगी बनाने के रचनात्मक काम में लग गए थे। अगर कोई उनसे मिलने जाता तो पहले तो वे उससे परंपरागत तकनीक और देशभर में हो रहे सैकड़ों प्रयोगों के बारे में घंटों बताते। फिर अपने पास संग्रहित दसियों माडल बताते। ग्राम विकास, कृषि, गौ-पालन और उर्जा आदि के देशज और परंपरागत अनुभवों और जानकारियों के बारे में बात करके कोई भी उन्हें अपना प्रशंसक बना सकता था।

खालिस्तान समस्या हो या घुसपैठ विरोधी आन्दोलन, उन्होंने संगठन के माध्यम से देश को ठोस सुझाव और सही निदान दिए। संघ के कार्यकर्ताओं को उस दिशा में सक्रिय कर आन्दोलन को गलत दिशा में जाने से रोका। पंजाब के बारे में उनकी यह सोच थी कि प्रत्येक केशधारी हिन्दू हैं और प्रत्येक हिन्दू दसों गुरूओं व उनकी पवित्र वाणी के प्रति आस्था रखने के कारण सिख है। इस सोच के कारण खालिस्तान आंदोलन की चरम अवस्था में भी पंजाब में गृहयुद्ध नहीं हुआ। इसी प्रकार उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बंगलादेश से आने वाले मुसलमान षड्यन्त्रकारी घुसपैठिए हैं। उन्हें वापस भेजना ही चाहिए। किसी भी समस्या की गहराई तक जाकर, उसके बारे में मूलगामी चिन्तन कर उसका सही समाधान ढूंढ़ निकालना उनकी विशेषता थी।

खालिस्तान आन्दोलन के दिनों में “राष्ट्रीय सिख संगत” नामक संगठन की नींव रखी गई, जो आज विश्व भर के सिखों का एक सशक्त मंच बन चुका है। आरएसएस के मुखिया के तौर पर वे हमेशा तुष्टीकरण के खिलाफ रहे, लेकिन मुसलमानों के भारतीयकरण के पक्षधर। उनकी ही प्रेरणा से राष्ट्रीय मुस्लिम मंच का गठन हुआ।

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