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आगामी मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले किसानों का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार आंदोलन का तरीका बदल चुका है। अब किसान राजधानी का रुख करने के बजाय अपनी तहसील और जिले में ही मोर्चा खोल रहे हैं। छोटे-छोटे लेकिन लगातार हो रहे ये आंदोलन सरकार के लिए बड़ी चुनावी चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।
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मध्य प्रदेश की सियासत में किसान फिर सबसे बड़ा मुद्दा बनने की ओर बढ़ रहे हैं। विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए लिखित जवाब ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में प्रदेश में किसान आंदोलनों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है।
आंकड़े बताते हैं कि हर महीने औसतन 25 किसान आंदोलन हुए हैं। यानी प्रदेश में हर दूसरे दिन एक आंदोलन दर्ज किया गया। सबसे अहम बात यह है कि ये आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक नेतृत्व के आह्वान पर नहीं, बल्कि स्थानीय समस्याओं को लेकर हुए हैं।
खाद-बीज की कमी, फसल खरीदी में देरी, समर्थन मूल्य, ई-टोकन व्यवस्था और सिंचाई जैसी समस्याओं को लेकर किसान अब अपने-अपने क्षेत्रों में सड़क पर उतर रहे हैं। यही वजह है कि आंदोलन अब प्रदेश स्तर के बजाय जिला और तहसील स्तर पर ज्यादा देखने को मिल रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इन स्थानीय आंदोलनों की संख्या और असर इसी तरह बढ़ता रहा, तो विधानसभा चुनाव से पहले यही छोटे आंदोलन एक बड़े किसान असंतोष का रूप ले सकते हैं। ऐसे में सरकार के सामने सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि किसानों के भरोसे को बनाए रखने की भी बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल प्रदेश की राजनीति में किसानों का मुद्दा सुलग रहा है। लेकिन अगर यह चिंगारी आग में बदली, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में विकास, वादे और राजनीतिक समीकरण सब पीछे छूट सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार समय रहते किसानों की नाराजगी दूर कर पाएगी, या फिर यही 'साइलेंट किसान वॉर' चुनावी रण का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाएगा?