अनूपपुर //वेद शर्मा //-जंक्शन की यह तस्वीर विकास के दावों पर एक करारा तमाचा है – दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल को करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाला अनूपपुर जंक्शन आज भी एक बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है। लगभग 10 वर्षों से टूटा पड़ा पैदल पुल अब सिर्फ़ लोहे और सीमेंट का ढांचा नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के प्रति प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है।
दूसरा फुट ओवर ब्रिज प्लेटफॉर्म के अंतिम छोर पर है, इसलिए बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ और दिव्यांग यात्री रोज़ अपनी जान हथेली पर रखकर पटरियाँ पार करने को मजबूर हैं। तस्वीर में दिख रहा यह दृश्य किसी नियम तोड़ने की जिद नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामी का प्रमाण है।
प्रश्न सीधा है—जब स्टेशन की दीवारों पर रंग-रोगन, सौंदर्यीकरण और उद्घाटन की राजनीति के लिए बजट है, तो यात्रियों की सुरक्षा के लिए फुट ओवर ब्रिज बनाने का बजट क्यों नहीं?
क्या रेलवे प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है?
विकास का अर्थ केवल चमकती दीवारें, नए बोर्ड और प्रचार नहीं होता। विकास वह होता है, जहाँ एक माँ अपने बच्चे का हाथ पकड़कर बिना डर के प्लेटफॉर्म बदल सके, जहाँ बुजुर्गों को पटरियों पर उतरने की मजबूरी न हो।











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