जहर खाकर ‘ ड्रामा’ करने वाला निकला समझौतावादी, पुलिस और पत्रकार भी हुए परेशान

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संवाददाता कन्हैया नाथ

सीहोर! भेरूंदा क्षेत्र में एक सनसनीखेज मामला उस वक्त सामने आया जब एक व्यक्ति ने जहरीला पदार्थ खाकर अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। वीडियो में खुद को सूदखोरी का शिकार बताते हुए उसने कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए, जिससे क्षेत्र में हड़कंप मच गया और पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ पत्रकारों में भी हलचल बढ़ गई।

जानकारी के अनुसार, थाना भेरूंदा अंतर्गत 2 अप्रैल 2026 को तलाई मोहल्ला निवासी 52 वर्षीय अशोक राठौर ने जहरीला पदार्थ खाकर वीडियो वायरल किया था। वीडियो में उसने अरविंद राठौर, अर्जुन राठौर एवं रमेश राठौर पर सूदखोरी और प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। मामला सामने आते ही पुलिस तत्काल हरकत में आई और अशोक राठौर को सिविल अस्पताल भेरूंदा से जिला अस्पताल सीहोर रेफर किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम को स्थानीय पत्रकारों ने प्रमुखता से उठाया। खबरों में इसे एक भोले-भाले व्यक्ति के साथ सूदखोरों द्वारा शोषण के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे आमजन में सहानुभूति की लहर भी देखने को मिली। सोशल मीडिया पर भी लोग भावुक हो गए और आरोपी पक्ष के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठने लगी।

लेकिन कहानी ने उस वक्त पलटी खा ली, जब अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद 4 अप्रैल को अशोक राठौर ने पुलिस के समक्ष अपने बयान दर्ज कराए। उसने बताया कि उसने घरेलू जरूरत के लिए 40,000 रुपये अपने रिश्तेदार अरविंद राठौर से उधार लिए थे। इसी बात को लेकर परिवार के भीतर कहासुनी हुई, जिससे आहत होकर उसने यह कदम उठा लिया।

चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन लोगों पर उसने गंभीर आरोप लगाए थे, वे उसके करीबी रिश्तेदार ही निकले—रमेश राठौर उसका सगा मामा है, जबकि अरविंद और अर्जुन उसके ममेरे भाई हैं। बयान में अशोक राठौर ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं चाहता और आपसी सहमति से मामला खत्म कर दिया गया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां पुलिस को बेवजह गंभीर मामले में उलझना पड़ा, वहीं पत्रकारों और आम जनता की भावनाएं भी भ्रामक जानकारी के कारण प्रभावित हुईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के घटनाक्रम समाज में गलत संदेश देते हैं, जहां पहले गंभीर आरोप लगाकर माहौल बनाया जाता है और बाद में समझौता कर लिया जाता है। इससे वास्तविक पीड़ितों के मामलों की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

संदेश साफ है:
सोशल मीडिया पर भावनात्मक वीडियो डालकर आरोप लगाने से पहले तथ्यों की गंभीरता समझना जरूरी है, वरना ऐसे “ड्रामे” न सिर्फ प्रशासन को गुमराह करते हैं, बल्कि समाज में भी भ्रम और अविश्वास पैदा करते हैं।

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